Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश के एक सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति को लेकर विवाद करीब तीन दशक तक चला। साल 2000 में अधिकारियों ने उनकी सेवा समाप्त कर दी थी। इसके बावजूद मामला अदालत में चलता रहा और कर्मचारी करीब 30 साल की सेवा के बाद 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले थे। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उनकी पेंशन, ग्रेच्युटी और दूसरे सेवानिवृत्ति लाभों की गणना करके जारी करने का निर्देश दिया है।
1997 में हुई थी नियुक्ति
मामला बलकृष्ण शर्मा का है। उन्होंने 11 जुलाई 1997 को जूनियर क्लर्क के पद के लिए आवेदन किया था। इस पद के लिए दो सामान्य श्रेणी की रिक्तियां निकाली गई थीं। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में सफल होने के बाद 31 जुलाई 1997 को जारी चयन सूची में उनका नाम दूसरे स्थान पर था।
इसके बाद 12 सितंबर 1997 को उन्हें नियुक्ति पत्र दिया गया और उन्होंने नौकरी शुरू कर दी। फैसले में दर्ज जानकारी के अनुसार नियुक्ति पत्र में उनकी नियुक्ति को मूल रिक्ति के विरुद्ध बताया गया था, हालांकि इसे अस्थायी प्रकृति का कहा गया था। बाद में इसी नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया।
2000 में क्यों खत्म की गई सेवा
जुलाई 2000 में मुख्य लेखाकार की एक रिपोर्ट सामने आई। इसमें कहा गया कि शर्मा की नियुक्ति वास्तव में उस रिक्ति पर हुई थी जो एक कर्मचारी के छुट्टी पर जाने से बनी थी। राज्य की ओर से कहा गया कि जिन दो पदों के लिए भर्ती निकाली गई थी, उनमें से एक पद पर बाद में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति हो गई थी, जबकि दूसरा पद चयन सूची में पहले स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को दिया गया था।
इसके बाद 13 सितंबर 2000 को शर्मा की सेवा समाप्त करने का आदेश जारी किया गया। उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 2012 में एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने विशेष अपील के जरिए इस मामले को डिवीजन बेंच के सामने रखा।
हाईकोर्ट ने राज्य के फैसले पर क्या कहा
इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले में देखा कि राज्य ने खुद रिक्तियों का विज्ञापन जारी किया था, भर्ती प्रक्रिया पूरी की और उसके बाद शर्मा को नियुक्ति पत्र दिया था। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने से पहले मूल विज्ञापन में किसी बदलाव की सूचना भी जारी नहीं की गई थी।
अदालत ने माना कि भर्ती प्रक्रिया पूरी करने और कर्मचारी को नियुक्त करने के बाद राज्य अपने ही फैसले से पैदा हुई स्थिति का पूरा असर कर्मचारी पर नहीं डाल सकता। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि शर्मा ने नियुक्ति पत्र मिलने के बाद करीब तीन दशक तक सेवा की।
करीब 30 साल की सेवा को कोर्ट ने माना अहम
फैसले के अनुसार शर्मा ने 12 सितंबर 1997 से सेवा की और 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले थे। यानी उन्होंने करीब 30 साल तक सेवा की। अदालत ने कहा कि उन्होंने निर्धारित चयन प्रक्रिया पूरी की थी और नियुक्ति पत्र मिलने के बाद इस आधार पर नौकरी की कि उनकी नियुक्ति स्वीकृत पद पर हुई है।
अदालत ने यह भी कहा कि सेवानिवृत्ति लाभ कर्मचारी की सेवा अवधि से मिलते हैं और केवल उस पद से जुड़े नहीं होते जिस पर कर्मचारी ने काम किया। करीब 30 साल तक सेवा लेने के बाद कर्मचारी को सेवानिवृत्ति लाभ से वंचित करना उचित नहीं होगा।
कर्मचारी को कौन-कौन से लाभ मिलेंगे
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को शर्मा के सेवानिवृत्ति लाभों की गणना करके उन्हें जारी करने का निर्देश दिया है। आदेश में पेंशन और ग्रेच्युटी के साथ दूसरे सेवानिवृत्ति लाभों का भी उल्लेख किया गया है।
| सेवानिवृत्ति लाभ | हाईकोर्ट का निर्देश |
|---|---|
| पेंशन | गणना करके जारी करने का आदेश |
| ग्रेच्युटी | गणना करके जारी करने का आदेश |
| अन्य सेवानिवृत्ति लाभ | गणना करके जारी करने का आदेश |
| समय सीमा | प्रमाणित आदेश मिलने के 30 दिन के भीतर |
अदालत ने 2012 में एकल न्यायाधीश के आदेश को भी रद्द कर दिया और शर्मा की विशेष अपील को स्वीकार कर लिया।
30 दिन के भीतर लाभ जारी करने का आदेश
14 सितंबर 2026 को दिए गए फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों को शर्मा के सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर उन्हें जारी करने को कहा। प्रमाणित आदेश मिलने के 30 दिन के भीतर पेंशन, ग्रेच्युटी और दूसरे सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया गया है।
इस मामले में अदालत का फैसला शर्मा की नियुक्ति की परिस्थितियों और करीब तीन दशक की सेवा को ध्यान में रखकर दिया गया है। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी दूसरे कर्मचारी की नियुक्ति में बाद में कोई कमी पाए जाने पर हर मामले में उसे अपने आप पेंशन या ग्रेच्युटी का अधिकार नहीं मिल जाता।
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