हरियाणा में सरकारी कर्मचारियों के माता-पिता को मिलने वाली वृद्धावस्था पेंशन अब उनके इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति रोकने का अकेला आधार नहीं बन सकती। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ऐसे 10 मामलों में कर्मचारियों के चिकित्सा खर्च के दावे खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए हैं। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को पात्र दावों का भुगतान करने के लिए तय समय में कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
यह मामला उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्होंने अपने माता-पिता के इलाज पर खर्च की गई रकम वापस पाने के लिए आवेदन किया था। कुछ मामलों में विभाग ने परिवार की आमदनी तय सीमा से अधिक होने का हवाला देकर भुगतान रोक दिया था। अदालत ने इन मामलों की सुनवाई में आय और माता-पिता की निर्भरता से जुड़े नियमों पर विचार किया।
₹3,000 पेंशन को लेकर क्यों उठा विवाद?
एक मामले में सरकारी कर्मचारी ने अपनी 70 वर्षीय मां के इलाज पर खर्च हुए ₹3.73 लाख की भरपाई मांगी थी। उनकी मां लंबे समय से बीमार थीं और उन्हें सरकार से मान्यता प्राप्त अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
लेकिन विभाग ने मेडिकल बिल का भुगतान मंजूर नहीं किया। इसकी वजह परिवार की मासिक आय को उस समय लागू ₹3,500 की सीमा से अधिक माना जाना था। यह सीमा वर्ष 2007 में जारी सरकारी निर्देशों में बताई गई थी।
इसी तरह के अन्य मामले भी हाई कोर्ट पहुंचे। कुल 10 याचिकाओं में चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति के दावे खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
पुराने सरकारी निर्देशों पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि विभाग की ओर से जारी प्रशासनिक निर्देश कानून के तहत बनाए गए नियमों से ऊपर नहीं हो सकते। पंजाब मेडिकल अटेंडेंस रूल्स, 1940 में पूरी तरह आश्रित परिवार के सदस्यों में माता-पिता को भी शामिल किया गया है। अदालत के अनुसार, इन नियमों में माता-पिता की निर्भरता तय करने के लिए कोई सख्त मौद्रिक सीमा नहीं रखी गई है।
फैसले में हरियाणा के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक की ओर से 3 फरवरी 2025 को जारी स्पष्टीकरण का भी उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया था कि ₹3,000 की वृद्धावस्था पेंशन को इस उद्देश्य के लिए आय नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि संबंधित मामलों में इलाज और खर्च को लेकर विवाद नहीं था। विवाद इस बात पर था कि माता-पिता की आय को किस तरह देखा जाए और क्या इसी आधार पर मेडिकल बिल का दावा खारिज किया जा सकता है।
माता-पिता की निर्भरता पर क्या कहा गया?
हाई कोर्ट ने साफ किया कि माता-पिता की निर्भरता का फैसला केवल उनकी आमदनी देखकर नहीं किया जाना चाहिए। उनकी शारीरिक स्थिति, बीमारी और देखभाल की जरूरत भी महत्वपूर्ण हैं।
अदालत ने एक महिला कर्मचारी के सास-ससुर के इलाज के खर्च से जुड़ा मामला भी देखा। संबंधित परिस्थितियों में खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार करना हरियाणा की चिकित्सा प्रतिपूर्ति नीति के अनुरूप नहीं पाया गया।
अधिकारियों को कितने समय में करना होगा भुगतान?
हाई कोर्ट ने 10 मामलों में चिकित्सा खर्च के दावे खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए। साथ ही संबंधित अधिकारियों को पात्र दावों की प्रक्रिया पूरी करके भुगतान करने का निर्देश दिया।
अदालत के आदेश के अनुसार, प्रमाणित प्रति मिलने के दो महीने के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करनी होगी।
इस फैसले से उन कर्मचारियों को राहत मिल सकती है जिनके माता-पिता के इलाज का खर्च केवल वृद्धावस्था पेंशन या आय सीमा की व्याख्या के आधार पर खारिज किया गया था। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में बिना जांच के भुगतान होगा। दावे की पात्रता लागू नियमों और संबंधित परिस्थितियों के अनुसार तय की जाएगी।
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