ST Certificate Cancelled: मद्रास हाईकोर्ट ने एक रिटायर कर्मचारी के पुराने अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र से जुड़े मामले में फैसला सुनाया है। कर्मचारी का यह प्रमाणपत्र करीब 40 साल बाद हुई जांच में सही नहीं पाया गया। कोर्ट ने कहा कि केवल रिटायर हो जाने या प्रमाणपत्र के बहुत पुराने होने से उसकी जांच बंद नहीं हो जाती। कर्मचारी ने पूरी पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट लाभ देने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।
आखिर यह मामला किस कर्मचारी का है?
यह मामला ए. जगन्नाथन और चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट से जुड़ा है। जगन्नाथन को वर्ष 1980 में एक सामुदायिक प्रमाणपत्र मिला था, जिसमें उन्हें हिंदू उराली जनजाति का सदस्य बताया गया था। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें ST के लिए आरक्षित पद पर चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट में नौकरी मिली। उन्होंने वहां तीन दशक से ज्यादा समय तक काम किया और 31 जनवरी 2013 को रिटायर हुए।
रिटायर होने के समय उनके सभी सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिए गए, क्योंकि उनके सामुदायिक प्रमाणपत्र की जांच चल रही थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में जाकर पूरी पेंशन, पेंशन की एकमुश्त राशि, ग्रेच्युटी, छुट्टी के पैसे और दूसरे रिटायरमेंट लाभ देने की मांग की। हालांकि, उनके प्रमाणपत्र को लेकर विवाद उनकी नौकरी के शुरुआती समय से ही चल रहा था।
पुराने प्रमाणपत्र पर सवाल कब उठा?
उनके प्रमाणपत्र की जांच का मामला वर्ष 1983 में भेजा गया था। जांच के दौरान अधिकारियों ने उनके ST होने के दावे पर सवाल उठाए। उनके स्कूल के रिकॉर्ड में उनकी जाति उराली गौंडर लिखी थी। इसके आधार पर वर्ष 1984 में सलेम कलेक्टर ने माना कि प्रमाणपत्र सही नहीं है और कर्मचारी यह साबित नहीं कर पाए कि वह उराली जनजाति से संबंधित हैं।
मामला इसके बाद भी कई साल तक चलता रहा। वर्ष 1986 में फिर से जांच के आदेश दिए गए और वर्ष 1990 में जिला कलेक्टर ने भी माना कि जगन्नाथन उराली गौंडर समुदाय से हैं, न कि अनुसूचित जनजाति से। इसके बाद सितंबर 1990 में उन्हें चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट की नौकरी से हटा दिया गया, लेकिन मामला कानूनी प्रक्रिया में आगे चलता रहा।
इतने साल बाद प्रमाणपत्र पर क्या फैसला आया?
बाद में मामले की जांच राज्य स्तरीय जांच समिति ने की। अलग-अलग स्तरों से होते हुए यह मामला आगे बढ़ा और 19 अगस्त 2021 को समिति ने अपना फैसला दिया। समिति ने माना कि जगन्नाथन का ST प्रमाणपत्र सही नहीं था। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी और अपने रिटायरमेंट लाभ देने की मांग भी की।
मामले में एक बड़ा सवाल यह था कि क्या इतने पुराने प्रमाणपत्र की जांच कर्मचारी के रिटायर होने के बाद भी की जा सकती है। कर्मचारी की ओर से कहा गया कि रिटायरमेंट के बाद ऐसी जांच नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 1995 से पहले जारी किए गए प्रमाणपत्र और उनके आधार पर हुई नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जाना चाहिए।
| समय | क्या हुआ |
|---|---|
| 1980 | सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी हुआ |
| 1983 | प्रमाणपत्र की जांच शुरू हुई |
| 1984 | सलेम कलेक्टर ने प्रमाणपत्र को सही नहीं माना |
| 1986 | दोबारा जांच के आदेश दिए गए |
| 1990 | जिला कलेक्टर ने ST का दावा स्वीकार नहीं किया |
| 31 जनवरी 2013 | कर्मचारी रिटायर हुए |
| 19 अगस्त 2021 | जांच समिति ने प्रमाणपत्र को सही नहीं माना |
| 16 सितंबर 2026 | मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया |
रिटायर होने के बाद जांच हो सकती है या नहीं?
मद्रास हाईकोर्ट ने कर्मचारी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि रिटायर होने के बाद पुराने प्रमाणपत्र की जांच नहीं हो सकती। कोर्ट ने 30 जुलाई 2026 के पूर्ण पीठ के फैसले का भी आधार लिया। उस फैसले में भी पुराने सामुदायिक प्रमाणपत्रों और रिटायर हो चुके कर्मचारियों से जुड़े मामलों पर विचार किया गया था।
कोर्ट ने माना कि केवल रिटायर हो जाने से पुराने प्रमाणपत्र की जांच बंद नहीं हो जाती। इसी तरह प्रमाणपत्र या नियुक्ति बहुत पुरानी होने से भी वह जांच से बाहर नहीं हो जाती। अगर किसी व्यक्ति को गलत प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी मिली थी, तो बाद में रिटायर हो जाने से वह नौकरी अपने आप सही नहीं मानी जाएगी।
कर्मचारी ने फिर से मौका देने की मांग क्यों की?
जगन्नाथन ने वर्ष 2021 के जांच समिति के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि उन्हें अपनी बात रखने का सही मौका नहीं मिला। उन्होंने कोविड-19 के दौरान पेश नहीं हो पाने की बात भी कही। हाईकोर्ट ने इस दलील को माना नहीं और कहा कि यह मामला पहले से लंबे समय से चल रहा था तथा कर्मचारी को अलग-अलग समय पर अपनी बात रखने के मौके मिले थे।
कोर्ट ने यह भी देखा कि जांच समिति के फैसले के समर्थन में रिकॉर्ड में पर्याप्त दस्तावेज मौजूद थे। इसलिए मामले को दोबारा जांच के लिए भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की गई। हाईकोर्ट ने वर्ष 2021 में दिए गए जांच समिति के फैसले को बरकरार रखा।
फिर कर्मचारी की पेंशन और दूसरे लाभों का क्या हुआ?
हाईकोर्ट ने जांच समिति के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ST प्रमाणपत्र को सही नहीं माना गया था। इसके साथ ही कर्मचारी की पूरी पेंशन, ग्रेच्युटी, छुट्टी के पैसे, पेंशन की एकमुश्त राशि और दूसरे रिटायरमेंट लाभ देने की मांग भी स्वीकार नहीं की गई। दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
कोर्ट ने चेन्नई पोर्ट ट्रस्ट को 19 अगस्त 2021 के जांच समिति के फैसले के आधार पर कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की अनुमति दी। इस मामले में कोर्ट की बात साफ रही कि कर्मचारी के रिटायर होने या प्रमाणपत्र के बहुत पुराने होने से उसकी जांच अपने आप खत्म नहीं होती।
यह भी पढ़ें: CGHS Rule Changed: केंद्रीय कर्मचारियों को बड़ी राहत, 5 किलोमीटर का नियम हुआ खत्म